ग़ज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

हम का करीं।

हम का करीं-
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बा गजब के सोच राखत आदमी हम का करीं।
सोच से बाटे अपरिचित सादगी हम का करी।।१।।

साॅंच के कचरत इहाॅं पर झूठ आगे धा रहल,
लोग के परतीत ओपर बा बड़ी हम का करीं।।२।।

नेति ना बाटे धरम ना नेति में बढ़िया करम,
रो रहल बा देखि के अब आख़िरी हम का करीं।।३।।

पैंतरा पर पैंतरा बा चाल बदलल आज कल,
घात सबसे करि रहल बदनीयती हम का करीं।।४।।

मोट मन के छोट तन में मुॅंह भइल सुरसा नियर,
खा दलाली रात-दिन भर नोकरी हम का करीं।।५।।

**माया शर्मा, पंचदेवरी, गोपालगंज (बिहार)**

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