कविता · Reading time: 1 minute

हमनी के बचपन

हमनी के बचपन
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हमनी के बचपन के सुनऽ कहानी,
जवना के नइखे अब कवनो निशानी।
मिले ना पिज़्ज़ा, ना बर्गर भा डोसा,
डोसा के छोड़ऽ मिले ना समोसा।
हाथे प आवे ना कहियो अट्ठन्नी,
दस बीस पइसा भा मिले चउअन्नी।
दसे गो लेमचुस में बीस लोग खाव,
मामा के दाँते से सगरी फोराव।
लेमचुस आ भूजा के रहे जमाना,
लन्चे में बाबू हो मिले ना खाना।
सूती के बोरा, शीशो के पटरी,
जाईंजा पढ़े त मारिंजा मछरी।
नरकट के कलम, खढ़िया के दुधिया,
बस्ता में चूवे त चले ना बुधिया।
सलाखे के पटरी राखल जा डोरा,
चेपी आ गोली से भरि जाव झोरा।
गेल्हीं जाँ पटरी करिखा रगरि के,
मुँह होखे करिया बाबू झगरि के।
नहरी में होखे तब खूबे नहान,
उ मस्ती के लौटी ना कबो जहान।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- २२/०१/२०२०

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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