दोहा · Reading time: 1 minute

सैनिक

आतंकी हमला कबो, कबो नक्सली घात |
दिल्ली में बइठल रही, अउर बनाईं बात ||१||

माई अपना पूत के, देत रहे आशीष |
रक्षा करिह देश के, कटे भले ही शीश ||२||

सरहद पर रहलें खड़ा, सब दिन बनके ढाल |
लिपट तिरंगा में गइल, भारत मां के लाल ||३||

नक्सल के आतंक में, भइल पूत आहूत |
धन्य कोख ऊ धन्य बा, जनलस वीर सपूत ||४||

गोली सीना बेध के, लीहलस छनहि जान |
मृत्यु वरण के बाद भी, मुहवाँ पर मुस्कान ||५||

पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’
मुसहरवा (मंशानगर)
पश्चिमी चम्पारण
बिहार

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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