लघु-कथा · Reading time: 1 minute

साड़ी

साड़ी
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बबलू ये बबलू कहा बाड़ऽ हो, दादी जोर जोर से हांक लगावत रहली पऽ बबलूआ कहीं लउकाते ना रहल।
ये फुलेसर कहां बा हो बबलूआ, बहुत ही देर से हांक लगावतानी पर ऊ कहीं बोलते नइखे।

माई तें झुठी- मुठी के परसान बाड़े होई कहीं अबहिये आ जाई।
का बात बा बोल तऽ?

छठ घाटे जायेके टेम हो गइल, सब लइकन नया जामा पहिन- वहिन के तइयार बाड़े सन ओकर कहूं पते नइखे चलत। घाटे ना जाई का?
अबहीन दादी के बात खतमो न भइल रहे तब ले बबलू एगो प्लास्टिक के थैली लिहले घरे पहुंचल।

दादी बबलूआ के कान पकड़िके –का रे बजरखसुआ घाटे ना जइबे का ये? ई का हाल बनवले बाड़े? सब लइकन तइयार- वइयार होके घाटे गइलन सन ते अबहियों घुमते बाड़े, जल्दी नवका जामा पहिन आ चल घाटे।

बबलू दादी के सब बात सुनला के बाद धीरे से ऊ प्लास्टिक वाली थैली दादी के हाथ मे़ दिहलन।

दादी – ई का ह रे?
बबलू – दादी देखबे तब न पता चली ई का ह।
दादी प्लास्टिक के थैली खोलि के जइसे ही देखली अवाक रह गइली। पुछलि ई केकर साड़ी ह बाबूओं?
बबलू कहलन दादी हमरा जवन पईसा जामा खरिदे बदे मिलल रहल ओहि पईसा तोहरा खातिर साड़ी लइनी हऽ। छठ तोहरा करे के बा हमरा ना, जब छठेहरू तू बाड़ू त नया कपड़ो तऽ तोहरे न किनाये के चाहीं।
✍️ पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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