घनाक्षरी · Reading time: 1 minute

समाजिक बुराई

माई-बाबू से बिगाड़, ससुरे से बड़ी प्यार-
भाई जस मुदई ना, केहू बा ज़हान में।
घरे-घरे इहे चले, दोसरा के दाल गले-
घर तुड़े वाला सभे, बोलेला जी कान में।।
माला फेरे जाप करे, रोजे पूजा पाठ करें-
बाप-माई भूखे सुते, अन्न देला दान में।
जीयते नऽ मान देवे, मुअला पऽ दान देवे-
करेला दिखावा खाली, झूठही के शान में।।
————–
बेटवन के भाव बा, बेटी से दुराव बा-
कोखिये में मार देलें, बाबुल नन्ही जान के।
बेटा बी ए पास करी, बबी चुल्हिये में जरी-
पापा अत्याचार करीं, रहेनी गुमान में।
जोर बा दहेज के, चिट्ठा भर पेज के –
घरवा- घड़ारी बिके, आज कन्यादान में।
रोजे- रोज मांग बढ़े, येही से तऽ बहु जरे-
मोल-भाव होत बाटे, रिश्तन के दुकान में।।
पं., संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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