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सपना बुझाला जहान

रसे रसे रोवे परान
ये भइया, सपना बुझाला जहान

होला जनम तब बाजेला बधइया
बाबूजी सनेह आ प्यार देली मइया
पढ़ेला लोग फेरू पावेला नोकरी
देश आ विदेश, गाँव घूमेला सगरी
होला बिआह फेरू होखेला गवना
बचपन, जवानी भइल जाला सपना
बचे ना कवनो निशान-
ये भइया, सपना बुझाला जहान

केहू ना जाने कि आगे का होई
सुख मिली केकरा आ के बस रोई
कइसे ऊ कटी बुढ़ौती के रतिया
पार लागी जिनिगी कि होई दुरगतिया
बेटा आ बेटी लो जानी ना जानी
का जाने पूछी कि ना केहू पानी
का जाने कइसन विधान-
ये भइया, सपना बुझाला जहान

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 15/02/2006

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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