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सइयां हम के दिखाई देतऽ मेला

सइयां हमके दिखाई देतऽ मेला, काहे करेलऽ झमेला
सङ्गे बनके तू रहतऽ अलबेला, काहे करेलऽ झमेला।।

सङ्गहि के सखी सब, भइली लरकोरिया।
हमका ना छोडला तू, कतहुं के ओरिया।
कइल जिनगी के तीन पाई ढेला, काहे करेल झमेला।
सईयां हमके दिखाई देतऽ मेला, काहे करेलऽ झमेला।।

रहे के अकेल रहे, हमें काहे लइलऽ ।
छोड़िके अन्हार घरे, दूरदेश गइलऽ।
हमके काटेला रात में अकेला, काहे करेल झमेला।
सईयां हमके दिखाई देतऽ मेला, काहे करेल झमेला।।

नाम धराईल बाटे, मोर कऊवा हकनी।
दर्शन देबऽ पिया, बोल देतऽ कखनी।
बलमु आव तू, करऽ जीन खेला, काहे करेल झमेला।
हमके दिखाई देता मेला, काहे करेल झमेला।।

पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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