गीत · Reading time: 1 minute

विजया फिर से आईल रहल

शादी के मुद्दा फिर गरमाईल रहल ।
विजया कल फिर से आईल रहल।
अपने भउजी के तिरलोक देखवले ,
अपने माई से भी अझुराइल रहल।
सावन बीतल फिर भादो आइल।
मनवा वोकर अब बा मुरझाइल।
शादी वोकर बस टरत जात बा।
माई भउजी से लड़त जात बा।
लेकिन सुनली हई कि एक ठे
बरदेखुआ आइल रहल।
शादी के मुद्दा फिर गरमाईल रहल ।
विजया कल फिर से आईल रहल।
शादी -वादी न होई त ,छत-वत से कूदी उ।
बाढ़ भी आईल बा ,ओही में जाके डूबी उ।
दुसरे के बरदेखुआ देख के ,बहुत ज्यादा
शर्माइल रहल।
शादी के मुद्दा फिर गरमाईल रहल ।
विजया कल फिर से आईल रहल।
केहू अगुआ वोकर शादी करा द।
विजया के बस मंसा पुरा द।
शादी के खातिर दुःखी बा दिल से,
मुँहवा वोकर मुरझाइल रहल।
शादी के मुद्दा फिर गरमाईल रहल ।
विजया कल फिर से आईल रहल।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी
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