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वन्दना

वन्दना–
छन्द – रक्ता छन्द (वार्णिक)
मापनी-२१२ १२१ २

साँच हार ना सकी।
झूठ ना चली,थकी।।
सोच ना करीं सभे।
नीति से डरीं सभे।।१।।

न्यायधीस राम जी।
ऊ दया क धाम जी।।
भक्त के पुकार से।
आ सकीं दुवार से।।२।।

हाथ जोड़ लीं खड़ा।
बा विधान जो कड़ा।।
राम जी क नाँव लीं।
माथ धारि पाँव लीं।।३।।

हो सकी तबे भला।
आ सकी सजी कला।।
जन्म धन्य हो सकी।
दुःख -दर्द खो सकी।।४।।

राम नाम तृप्त हो।
मोह में न लिप्त हो।।
जिन्दगी न खास बा।
मानि लीं कि नास बा।।५।।

**माया शर्मा,पंचदेवरी,गोपालगंज(बिहार)**

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