मुक्तक · Reading time: 1 minute

रिश्ता

रिश्ता में आवत हवे,जबसे कुछ प्रतिरोध।
बाति-बाति पर होत बा, देखिं आज विरोध।
लालच में आन्हर भइल, लाभ-हानि के फेर-
समझे ना देला कुछो, दिल में भरल किरोध।

#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य’

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