कविता · Reading time: 1 minute

मेहरि के गोड़धरिया करऽ

सुबह शाम दुपहरिया करऽ।
मेहरि के गोड़धरिया करऽ।

हेलो डियर डार्लिंग बोलऽ।
जब-जब आपन मुँहवा खोलऽ‌।
दांँत चियारऽ गले लगावऽ।
अंगुरी झोंता में अझुरावऽ।

घर, आँगन, दुअरिया करऽ।
मेहरि के गोड़धरिया करऽ।

तकिया चादर धोवल करऽ।
भलहीं‌ छुप छुप रोवल करऽ।
कबहूं नाहीं मुंह लडावऽ।
शाम होत घर में चलि आवऽ।

तिजहरिया भोरहरिया करऽ।
मेहरि के गोड़धरिया करऽ।

कहना सगरो मानल करिहऽ।
जान स ज्यादा जानल करिहऽ।
गलती पर माफी मुँहवा से।
हथवा से पग छानल करिहऽ।

गांव‌ देहात शहरिया करऽ।
मेहरि के गोड़धरिया करऽ।

‘सूर्य’ कहेलन मानऽ कहना।
पल भर मेहरि बिन ना रहना।
जोर जुलुम हऽ मर्द क गहना।
शीश झुकाय पड़ी सब सहना।

उनकी नाम उमरिया करऽ।
मेहरि के गोड़धरिया करऽ।

(स्वरचित मौलिक)
#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य
तुर्कपट्टी, देवरिया, (उ.प्र.)
☎️7379598464

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