कविता · Reading time: 1 minute

मुखिया के चमचा

मुखिया के जब चमचा डोले
खुद के ही ऊ मुखिया बोले।
सूट-बूट बा अइसे झारे
साहब जइसे बात बघारे

रोब दिखावे मुखिया जइसे,
बोले तब काँपेला अइसे
मिर्गी जइसे लगे बिमारी,
बीवी रोए बड़ा बिचारी।

लाज तनिक ना ओकरा लागे,
बात बात मे बहुते जागे।
ए साल के बाद का होई
हड्डी खातिर चमचा रोई।

काम करे ना ऊहो कौनो,
पाई ना पावऽता जौनो।
ए साल के बाद का होई
चप्पल खातिर लइका रोई।

रहन लोग सब जान गइल बा,
नियतो के पहिचान गइल बा।
घास कबो ना केहू डाली,
पईबऽना अब कबो छाली।

पाँच साल खूब खइलसऽ खाजा,
बुझलसऽ हईं हमही राजा।
ई साल जब खतम हो जाई,
लइकन के ना फीस दिआई।

एकरा बाद रहबऽ अइसे,
नाटक के राजा के जइसे।
“जटा” के न धमकावऽ भाई,
सोचऽ तब का करी लुगाई।

✍️जटाशंकर”जटा”
२७-०१-२०२०
ग्राम-सोन्दिया बुजुर्ग
पोस्ट-किशुनदेवपुर
जनपद-कुशीनगर
उत्तर प्रदेश
मो०नं०-९७९२४६६२२३

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ग्राम-सोन्दिया बुजुर्ग पोस्ट-किशुनदेवपुर जनपद-कुशीनगर उत्तर प्रदेश मो०नं० 9792466223 --शिक्षक ---पत्रकार ---कवि
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