मुक्तक · Reading time: 1 minute

मंगरुआ के बोखार हो गईल

हीट हो गईल बा माथा ,मंगरुआ के बोखार हो गईल।
माई ओकर गरियावत बा ,ई त अब बेकार हो गईल।
डॉक्टर अइलें सुई लगवले तब्बो न आराम भईल,
गाँव मे हल्ला हो गईल की,करोना से एहके प्यार हो गईल।
मंगरुआ जबसे ई सुनले बा ,चैन के नींद न सोवत बा।
गाँव भर के खेतन में , गारी के बीआ बोअत बा।
अभी एहि सोच में डूबल रहल कि ,दादा के पुकार हो गईल।
हीट हो गईल बा माथा ,मंगरुआ के बोखार हो गईल।
केहू गाँव में हल्ला कइले की ,कुहड़ खाँसी आवत बा।
रात भर देही दुखत बा ओकर, रह रह उबासी आवत बा।
इतना बेमार हो गइल बा, कि लागत बा घरबार खो गईल।
हीट हो गईल बा माथा ,मंगरुआ के बोखार हो गईल।
आजिज आके मंगरुआ अस्पताल गईल और टेस्ट करवलस।
आपन नेगेटिव रिपोर्ट घूम घूम के, गाँव भर के देखवलस।
गाँव भर सोच में डूब गईल, ई कइसन चमत्कार हो गईल।
हीट हो गईल बा माथा ,मंगरुआ के बोखार हो गईल।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी
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