कहानी · Reading time: 2 minutes

**भसुर**

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बर-कनिया के आशीष देके जब मीरा आ महेश मंच से उतरल लोग त मीरा माथ ढँपले घर में चलि गइली कि तबे एकजने बराती आ के महेश से कहलें-“हम राउरी मलिकाइन से मिले के चाहत रहनी हँ। उहाँ के नाँवँ मीरा ह का?”महेश पुछलें-“का बाति बा।काहें मिलल चाहत बानीं?कइसे जानत बानी रउवा?”बाराती कहलें -“हम एगो शिक्षक हयीं।उहाँ के हमार फेसबुक मित्र बानीं,एसे।” “अच्छा..!ई बात बा..चली अबे मिला देत बानीं”-महेश मूड़ी हिलावत कहलें।
अब बोला के भीतरी ले गइलें आ.मीरा के हाँक लगवलें-मीरा!हेने आव$..तहसे केहू मिलल चाहत बा।”मीरा हाँक सुनते झड़कल अइली-“के ह?”सम्हने अनजान आदमी के देखि के सकुचइली-का ह?के हयीं इहाँ के?”एतने में बाराती हाथ जोरि के खड़ा हो गइलें-हमार नाँवँ त्रिभुवन ह।” “त्रि-भू-व-न…कहाँ के त्रिभुवन?हमरा मन नइखे परत” ;मीरा कहली।”हम राउर फेसबुक मित्र बानीं।मंच पर देखते चीन्हि गइनीं हँ कि रउवे कवयित्री मीरा हयीं।एसे मिले के जरूरी समझनी हँ।” “ओहो..त्रिभुवन जी **शिक्षक**-अब चिन्हा गइनीं।अउर बतायीं इहाँ कइसे?” “बराते आइल बानी”-त्रिभुवन कहलें। अब त दोहरउनी नाश्ता मिलल। ढे़रे बाति लिखाई-पढ़ाई के भइल।
ओने बादर अब बरिसे की तब बरिसे।सब कार जल्दी -जल्दी निपटावल जात रहे।
बतियावत-बतियावत त्रिभुवन कहलें कि राउर रचना हमरा बहुत पसन्न परेला।बहुत बढ़ियाँ रउवा लिखेनीं।बाकिर सब रचना फेसबुक पर भेज दिहला से का मिलेला? फलाने-फलाने त आपन रचना जोगावेला लोग।आ मंच पर चढि के भँजावेला लोग।
मीरा हँसली-“हम आपन रचना फेसबुक पर ना भेजतीं त… रउरी जइसन पाठक पढतें कइसे? आ मिलतें कइसे? अब रहल बात जोगावे वाला लोगन के… त ओ लोग खातिर बकियवा रउवा कहिए दिहनीं।भँजावल हमार धेय नाहीं हँ।”कि एतने में केहू आके कहल-“तहनी के एइजा बाड़ जा ओने गुरहथन रूकल बा।” “काहें”-मीरा पुछली।”भसुरे नइखें मिलत।आकि अइलहीं नइखें।सब लोग परसान बा।बरतिया कहत बाड़ें कि सथवे अउवें।एइजा खोजाता त हइए नइखें।कहीं अपहरण त ना होगइलें बीचही में..बरखा बा कि झिंसियाता”-जबाब मिलल।
एतना सुनते त्रिभुवन चिहाके उठलें-“अरे बाप रे..अब हम जात बानी।”मीरा पुछली-“काहें”?”जल्दी-जल्दी डेग बढ़ावत त्रिभुवन कहलें -“हमही नूँ भसुर हईं।”
माड़ो में भसुर के दउरत पहुँचल देखि सबके हँसला के धरानि ना रहे।

**माया शर्मा,पंचदेवरी,गोपालगंज(बिहार)**

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