कविता · Reading time: 2 minutes

“भईया के पेट खराब रहल”

कुछउ उनसे बात करि त ,
बिखिन भरल जवाब रहल,
बीस कोन के मुँह बनावस,
भइया के पेट खराब रहल।

सूरज के जब चाप चढ़ल
गर्मी से सभे बेहाल रहल,
पेट में केतना आग रहल,
ना पूछीं कइसन हाल रहल।

कबहु भीतर, कबहु बाहर,
दउर दउर दिन रात कटल।
बेरि-बेरि कि केतना बेर,
का कही ना हिसाब रहल।

उठ जाए उ तड़के तड़के,
रह जाये कुछ छीटें पड़के,
गरज तड़प के बादल बरसे,
तड़क भड़क के छूछे भड़के।

पेटसफा और एलोवीरा,
करें उपाय ना कौनो जीरा।
रामदेव और बालम खीरा,
बन जाए बस पेट ई हीरा।

हजमोला ना हजम करे अब,
कौनो असर ना ओकर होला।
लपट उठे एह पेट मे अइसन,
बनि के बमके बम के गोला।

एक रात के बात सुनी,
बस तीन पहर ही बीतल बा।
अधकचरे में नींद खुलल बा,
पेट में अईठन उठल बा।

खोजलें घर में लोटा लाठी,
लोटा मिलल न लउके लाठी।
अन्हारे धुन्हारे गइले पिछुवारे
देखले बोतल खोंसल टाटी।

तेजी में उ लॉएट छोरले।
जइसे तइसे पानी भरले,
झट पाएंट के ढीला कइले,
झप देना तब आगे बढ़ले,

अटकल सांस गले में कब्बे,
स्पीड भईल तब अस्सी नब्बे।
लउके राहि ना देंखें जब्बे।
पेट कहे कि अब्बे तब्बे।

दुईगो कुकुर आहट पाके,
एन्ने ओने लगलसन झाँके
अबरा-झबरा तरनइले सन,
शेरुवा भोकलस फुरनाके।

सुनि के कुकुरन के भोंपा,
दउरल मनई के झोंपा,
लाठी लेके झगरू कहले,
अइलस डाकू दउर सोखा।

दुई लबदा जब देह पे गिरल,
घाव लागल करीआंव में,
लईकाचोर ई धरकोसवा ह,
भईल तमासा गाँव मे,

आहि रे दादा आहि रे माई,
हमिह हई हो झगरू भाई,
जनि हमके मारो हो सोखा,
अनझिटके में भईल धोखा।

अजीब तहनी के लीला बा,
भाई पेटवे ह तनि ढीला बा,
हई देखअ हाथ मे लोटा बा,
और हाथ गोड़ सब गीला बा।

कहत रहनी ह कहिया से,
भइया का बात बुझाई ना,
डोल-डाल के गरज रहे त,
खुले में शौच के जाई ना,

आप सभी से का बतलाई,
केतना दरद ना गिनती बा,
एके गो उपाय करि बस,
हाथ जोड़ के विनती बा,

घर में शौचालय बनवाई,
ना तनिको पाखण्ड करीं।
इज्जत आपन बचा के राखी,
खुले में शौच अब बन्द करीं।
✍🏻सुजीत पाण्डेय©️
पडरौना,कुशीनगर
9696904088

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