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बलमू तऽ भइलें जुवारी

बा चलत करेजा पऽ आरी हो, खेत कोड़े बेचारी,
कि बलमू तऽ भइलें जुआरी हो, खेत कोड़े बेचारी।

तनिको शरम बा न नजरी में पानी,
कि बान्हें धराइल सोना आ चानी,
लागल बा कइसन बेमारी हो, खेत कोड़े बेचारी-
कि बलमू तऽ भइलें जुआरी हो, खेत कोड़े बेचारी।

घर में अनाजे के बा परेशानी,
मरदू के जुआ, शराब जिंदगानी,
मेहरी के जिनिगी कुदारी हो, खेत कोड़े बेचारी-
कि बलमू तऽ भइलें जुआरी हो, खेत कोड़े बेचारी।

जुअरियन से भरले रहेला घारी,
मरदू ना मानस सुनियो के गारी,
कइ लिहलें चोरन से यारी हो, खेत कोड़े बेचारी-
कि बलमू तऽ भइलें जुआरी हो, खेत कोड़े बेचारी।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 07/04/2000

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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