मुक्तक · Reading time: 1 minute

बरखा पर के घाम

लागल बाटे रोपनी, जरे देह के चाम।
अन्न क दाता हऽ कृषक,कइसे करी अराम।
माथे बीज कुदार धर, चलल खेत की ओर-
लागे ला मरिचा नियन, बरखा पर के घाम।

(स्वरचित मौलिक)
#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य’
तुर्कपट्टी, देवरिया, (उ.प्र.)
☎️7379598464

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