ग़ज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

बनि के आपन निरास कर देला

बनि के आपन निरास कर देला
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बनि के आपन निरास कर देला
हद से ज्यादा उदास कर देला

हम त मिल-जुल के बस रहीं लेकिन
ऊ त लफड़ा पचास कर देला

जहिया बेंचेला हार सोना के
खाली सगरी गिलास कर देला

तास दारू मजा त दे ताटे
बाकी घर के विनास कर देला

दूर हरदम ग़ुरूर से रऽहऽ
ई त मालिक से दास कर देला

काँहें “आकाश” आज दुनिया में
घात आपन ही खास कर देला

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 07/07/2020

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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