ग़ज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

बनल देहिया बा माटी के, निरेखला से जी का होई।

बनल देहिया बा माटी के, निरेखला से इ का होई।
पिंजरवा तोड़ि के एक दिन, सुगनवा त दफा होई।

चलीं रहिया भलाई के, जिन्दगियां के इहे मक़सद,
विधाता भेजले बाड़ें, ऊ कमवा त पता होई।

भरम पलले से कवनो फायदा, केहू के ना होला,
तऽ बोला तू भरम पलबऽ, का कवनो फायदा होई।

ठठरिये पर उठा तोहके, ले जइहें चारिगो मनई,
जियत जालऽ त लागेला, जगत से आसरा होई।

ई सावन भा ई फागुन त, कबो आवेला चलि जाला,
कबो सोचे कि हमरा से, केहू के कुछ गिला होई।

ई जिनिगी में अन्हरिया, घेर लिहले बा तू मति सोचा,
अंजोरिया से बनल दूरी, भइल कवनो खता होई।

ओहरिया लाल भा उज्जर, मिले ऊ आखिरी थाती,
ना कुछऊ साथ जाई हो, सचिन सब कुछ फना होई।

पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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