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प्रकृति से पंगा

नमन मंच
प्रकृति से पंगा
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मौत के नियरे बुला के, देख लीं बतिया रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।

एक से बड़ एक देखीं, बन रहल हथियार बा अब।
अंत के सामान से ही, कर रहल मनु प्यार बा अब।
काल से नैना लड़ा अब, पास ही बुलवा रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।१।।

आग लगले पर चलल बा, आज ई उद्गम खुदावे।
मर्ज हद से बढ़ गइल हऽ, तब चलल वैदा बुलावे।
योग के उत्योग से मुख, मोड़ अब पछिता रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।२।।

रोज ही अपने बनावत, मौत के सामान बा अब।
काठ के कोल्हू बनल ई, आदमी नादान बा अब।
स्वप्न देखत स्वर्ग के ई, नर्क में ही जा रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।३।।

गाछ सगरी काट दिहलस, शुद्ध वायु बा कहाँ पर?
जिन्दगी जीये बदे ई, आज अब जाये जहाँ पर।
सांस लेहल बा दुभर अब,देख लीं ग़म खा रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।४।।

नीर से खिलवाड़ कइलस, प्यास से बेदम भइल बा।
जल बिना मछरी बनल ई, प्यास से ही मर गइल बा।
वेद पाठी ज्ञान के विज्ञान ही भड़का रहल बा।
आज अपने ही पतन के, गीत मानव गा रहल बा।।५।।

✍️ पं.संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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Author
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है। Books: कुसुमलता (अभिलाषा नादान की)…
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