कविता · Reading time: 1 minute

ना सियरा तरकुल तर जाई

सुनीं सुनाईं एक कहानी,
पांच साल के ई परधानी।
एतने दिन के बन के राजा,
खाके भइलें मोटा ताजा।

पांच साल के बा परधानी,
आई बुढ़ापा जाई जवानी।
एतना मत सबके दबियावअ,
बात बात मे मत गरीयावअ।

कुछ दिन अउर मलाई काटअ,
मत सबका के अईसे डाँटअ।
ई दिन फिर कबो ना आई,
ना सियरा तरकुल तर जाई।

केतनो करबअ सबसे विनती,
पार न होई सौ के गिनती।
याद करी सब लोगवा गारी,
सबसे कईलअ मारामारी,

राजा बन खुब चरलअ खेत,
शरम न आईल पईसा लेत।
विधवा से लेई दुई हजार,
देहलअ पेंशन के उपहार।

बिना कमाई बिल्डिंग चमके,
सेंट इतर से देहिया गमके।
जनता सोचे कहाँ से आईल,
एतना जल्दी झलकल टाइल।

ना पेशा ना कवनो नोकरी,
ना ढोवेलअ कवनो टोकरी।
गाड़ी घोड़ा कहाँ से भईल,
पईसा नाली के कहवाँ गईल।

छुअले बा ना खुरपी कबो,
मनरेगा में आगे अबो।
केतने नवकी मउगीन के खाता,
भरलअ रहअता पईसा जाता।

मन ही मन सब लोग विचारे,
तहरी करनी खूब बघारे।
पांच साल अब कईसो कटे,
इ परधानी जल्दी हटे।

अबकी बार ना होई धोखा,
ना पईसा ना लिट्टी चोखा।
मुखिया चुनल जाई अइसन,
“जटा” मान ल सेवक जइसन।

✍️जटाशंकर”जटा”
०९-०२-२०२१
ग्राम-सोन्दिया बुजुर्ग
पोस्ट-किशुनदेवपुर
जनपद-कुशीनगर
उत्तर प्रदेश
मो०नं० ९७९२४६६२२३

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ग्राम-सोन्दिया बुजुर्ग पोस्ट-किशुनदेवपुर जनपद-कुशीनगर उत्तर प्रदेश मो०नं० 9792466223 --शिक्षक ---पत्रकार ---कवि
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