मुक्तक · Reading time: 1 minute

दाल के तड़का

आईं – गाईं करत रहलें बस ,बात होत रहे बड़का -बड़का।
एक बार नहीं कई बार पुछाईल, एके बात के हड़का- हड़का।
समय से अगर तड़का मिली जइतें लास्ट बार के बात रहे,
अबकी बार बस पूछि लेंती ,बताव कब लगी दाल के तड़का।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी
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