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दउरिहे भकोसना

फोकटे में दाल चाउर सगरो बाँटाता,
दउरिहे भकोसना ले आवे सभे जाता।

अगलगि में बटात बाटे कपड़ा आ रासन,
बहुते कुछ देत बाटे दुखियन के शासन,
दुखियन से सुखियन के बेसिये दियाता-
दउरिहे भकोसना ले आवे सभे जाता।

हरदम ना मिली अइसन नीमन सुतार रे,
दउरताटे लोग तनी होनेहो निहार रे,
लूटला में लाज का बा सब जघे लुटाता-
दउरिहे भकोसना ले आवे सभे जाता।

देहि धाजा पवले तें बाड़े सीधा-साधा,
येहि से जे काम करबे हो जइबे आधा,
कइला के गरजे का बा सुखले भेंटाता-
दउरिहे भकोसना ले आवे सभे जाता।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 04/05/2000

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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