गीत · Reading time: 1 minute

तू गावत रहिअ ए चिरई

तू गावत रहिअ
ए चिरई
गुनगुनावत रहिअ
ए चिरई…
भूख से रोवत
बच्चन के
बहलावत रहिअ
ए चिरई…
विरह के मारल
प्रेमी के
सुतावत रहिअ
ए चिरई….
आफत-विपत में
देश के
जगावत रहिअ
ए चिरई…
पिंजरा में भी
नाचके
देखावत रहिअ
ए चिरई…
औरत जात के
डर सगरी
भगावत रहिअ
ए चिरई…
टूटलो पांख से
उड़ के
देखावत रहिअ
ए चिरई…
जिंदादिली के
पाठ सबके
पढ़ावत रहिअ
ए चिरई…
मरघट में भी
गीत जीवन के
गूंजावत रहिअ
ए चिरई…
#Geetkar
Shekhar Chandra Mitra
#RomanticRebel
#जनवादीगीतकार

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