मुक्तक · Reading time: 1 minute

ताकब त नाहीं

मनवा के, मनवे मुताबिक चलत बा सब, समझाइब, कब ले?
सूतल त नाहीं, आंखि मूनि ओंठगल बा, जगाइब, कब ले?
रूप पे फूल के मोहाइल बात अइसन त नाहीं,,
ताकब त नाहीं बकिर महक से खुद के, बचाइब, कब ले?

– गोपाल दूबे

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