गीत · Reading time: 1 minute

तबो समधी के जीव ललचाई रे

भले बारहो विजन परोसाई रे,
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने सड़किया से समधी जी आइबि,
देबऽ बेला-चमेली बरसाई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने कुरुसिया प समधी जी बइठबि,
देबऽ सोने के पालिश कराई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने रे मेंजवा प समधी जी खाइबि,
देबऽ हीरा-मोती से जड़वाई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने रे पनिया के समधी जी पीयबि,
ओहिमें अमरित तू देबऽ ढरकाई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने सेजरिया प समधी जी सूतबि,
देबऽ मखमल के चादर बिछाई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

जवने सवरिया से समधी जी जाइबि,
ओहिमें भर भर के रुपिया ठुसाई रे-
तबो समधी के जीव ललचाई रे।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 09/05/2000

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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