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खदेरन के माई

तेतरी चच्ची एक रोज ,खदेरन के माई लगे गइल रहलिन।
ये रउरो खदेरन बाबू कहाँ बाटें ,खदेरन के माई से कहलिन।
तुरन्त जवाब दिहलीन खदेरन के माई।
खदेरना के चाहत बा मजिगर दवाई।
कहीं उफ़्फ़र परत होइ ओबाकटवना।
एकदम आवारा हो गइल बा माटीलगना।

ये कठिन शब्द में उ (खदेरन कर माई) फिर कहलिन-
का कहीं ये रउरो ,ई कोरोनवा जबसे आइल बा।
मोहबाइल में पढ़ी पढ़ी के ,ई खदेरना पगलाइल बा।
भूसा और गोबर भरल बा खदेरना के दिमागें में।
आग लग गइल बा हमरे मलिकार के विभागे में।
ऐसे लगल रही त ,एक दिन जरूर उपवास होइ।
अभिन खदेरना के परीक्षा बा ,का जने की पास होइ।
तेतरी चच्ची उत्साह में अइलींन और नयूज सुना दिहलीन।
खदेरन के माई के दिल ,अचानक से दहला दिहलीन।
है रउरो का जानत नईखी राउर खदेरना पास हो गइल।
ई बात अलग बाटे पढ़ाई के, सत्यानाश हो गइल।
ई सुनते खदेरन के माई ,अब हक्का – बक्का हो गइली।
तेतरी के बस देखत रही गइलीं और उचक्का हो गइलीं।
ई कैसे भएल ये रउरो बिना इन्तहाने के पास हो गईल।
ये किरोना में सब सम्भब बा ई हमके विश्वास हो गइल।
खैर हमार लरिकवा खदेरन, बड़ा मेनहत करत रहल।
पढ़त पढ़त सूति जात रहे ,मोहबाइल वैसे जरत रहल।
वैसे उ खूबे ,अच्छे लम्बर से पास हो जात।
मेहनत त कइले रहल जाड़ा, गर्मी,अउ बरसात।
सरकार के यह किरपा से ,अब लखैरे भी टॉपर हो जईहे।
दुइ मिनट में सब बदल जाई ,लइके हेरी पॉटर हो जइहें।
जाए द खदेरन के माई ,मनके अपने शानत करवाव।
खदेरन बाबू पास हो गइले अब जाके मिठाई बटवाव।
-सिद्धार्थ पाण्डेय

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी
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