ग़ज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

केहू फुलवा

केहू फुलवा से रहिया सजावे, केहू कांटा बिछावल करेला
चान कइसे के उतरी अँगनवा, लोग कनखी से ताकल करेला

कवनो आन्ही हो, कवनो बवण्डर, बार बांका न करि पाई ओकर
जेकरा माथे प माई के अँचरा, काल भी ओसे काँपल करेला

फोरि पइब न हमनी के घरवा, नांव लेके धरम-जाति के तूँ
ई ह गंगा अ जमुना के धारा, मइलि सब कर बहावल करेला

ए गो रँग ई हो जिनिगी के हउए, चारि दिन में तूँ घबड़ात बाड़
फूल खिलला से पहिले बगइचा, आके पतझर बहारल करेला

उनसे नेहिया लगवला से पहिले, मन में धरिह ‘असीम’ ए गो कहना
ई ह दीया के आदति पुरनकी, मीत बनि के जरावल करेला
© शैलेन्द्र ‘असीम’

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शैलेन्द्र कुमार पाण्डेय उपाख्य : 'असीम' माता : स्व. द्रौपदी पाण्डेय पिता : स्व. सूर्यभान पाण्डेय पत्नी : श्रीमती प्रिया पाण्डेय पुत्रियां : श्रेया नव्या तन्वी शिक्षा : एम.एस-सी., बी.एड.,…
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