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कुछ दोहा

नमन भोजपुरी दोहालय मंच

मिलल न कुछऊ सेतिहा, मान, शान, सम्मान।
त्याग दिहल अभिमान जे, पावल साँचा ज्ञान।।

मुफ्त मिलल बा लूटिहन, झोला भरि के यार।
दाम तनिक लागत हवे, कहत हवन बेकार।।

सुख-दुख सब लागल रही, चिंता के का बात।
रोज होत बा देख लीं, दिन के पीछे रात।।

सस्ता सबदिन रोइहन, महँगा बस दिन चार।
ठोक बजा के लीं सभे, सउदा नगद उधार।।

नियराइल जबसे हवे, भाइया सुनऽ चुनाव।
चिप्पी साटी के राहि में, लिखवावत सब नाव।।

फीवर कम ना कर रहल, पैरासीटामाॅल।
बाकी तऽ सब ठीक बा, का बतलाईं‌ हाल।।

ओखर में मूड़ी पड़ल, लागे कतनो चोट।
आफत पड़ल कपार पर, भइया बहुती मोट।

चिंता कइले का मिले, तनिका करीं विचार।
चिंतन से चिंता सजी, छन में जाला हार।।

गुरुजन के भरमार बा, चेलवन के अकाल।
बिना बात के बात पर, काटऽ ‘सूर्य’ बवाल।।

इरिखा मन में पालि के, रिश्ता मत दीं तोड़।
राम राम कहते चलीं, जिन लिहलन मुंँह मोड़।।

हासिल कुछऊ ना भइल, ईर्ष्या से कुछ खास।
मिहनत पर अपनी सदा, कइल करीं विश्वास।।

परगति के दुश्मन बनल, ईर्ष्या लालच मोह।
ऊठे ना देई कबो, जाति धर्म के छोह।।

बुढ़वा बा सठिया गइल, करे खूब बकवास।
लागत बा चाहत हवे, तालीबानी बाँस।।

सुमिरन माई बाप के, ता पाछे भगवान।
कृपा करीं से देव हम, बनल रहीं इंसान।१।

सरहद पर साजन हवें, रक्षक अब भगवान।
देश प्रेम दिल में हवे, हवे हथेली जान।।

#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य

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