दोहा · Reading time: 1 minute

किताब

पढि लऽ लिखल किताब में, नैन हृदय के द्वार।
जे अँखिया ना पढि सकल, पोथि पढ़ल बेकार।।

जे चाहे आ के पढ़ो, हिरदय खुलल किताब।
लिखनी हम महबूब के, हर्फ हर्फ महताब।।

सम्मुख सबकी बा खुलल, हमरो आज किताब।
पन्ना-पन्ना देख लीं, सूखल मिलल गुलाब।।

#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य

14 Views
Like
You may also like:
Loading...