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काहे के झगरा झंझट

काहे के झगरा झंझट
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काहे के झगरा झंझट काहे के मारा-मारी।
छोड़ि के सबकुछ बा जाये के पारा-पारी।।

केहू के सता के केहू के रोआ के,
बोलअ का पइबअ तू अगिया लगा के,
बड़हन तू हो ना जइबअ केहू के झुका के,
के नइखे झुकल सोचअ दुनिया में आ के,
पहिले ई सोचअ फेरू दिहअ ये भइया गारी-
छोड़ि के सबकुछ बा जाये के पारा-पारी…
काहे के झगरा झंझट!!

ढेर अभिमान करबअ अपने नुकसान करबअ
चैन से सुतबअ ना सबके परेशान करबअ
सोचअ आ ध्यान करअ सबके सम्मान करअ
जीनिगी में काम एगो कवनों महान करअ
तबे त मान करी गँउंवा के नर-नारी-
छोड़ि के सबकुछ बा जाये के पारा-पारी…
काहे के झगरा झंझट!!

कवनों तू भूल करअ ओके कबूल करअ
तिनका के ये तरे मत तिरशूल करअ
भितरा तू ज्ञान भरअ मत सुनअ कान भरअ
प्रेमे से गँउंवा आ सगरी जहान भरअ
प्रेमवे के जीत होई घिरना जरूरे हारी-
छोड़ि के सबकुछ बा जाये के पारा-पारी…
काहे के झगरा झंझट!!

रचना- आकाश महेशपुरी

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संक्षिप्त परिचय : नाम- आकाश महेशपुरी (कवि, लेखक) मो. न. 9919080399 मूल नाम- वकील कुशवाहा जन्मतिथि- 15 अगस्त 1980 शैक्षिक योग्यता- स्नातक ॰॰॰ प्रकाशन- सब रोटी का खेल (काव्य संग्रह)…
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