कविता · Reading time: 2 minutes

कइसन रोग कोरोना बा…

कइसन रोग कोरोना बा…
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पहिले के दिन लौटी कबो बुझाते नइखे
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

पूजा गाँवे गाँवे भइल कसाई के
माटी खोनि हलावल गइल मिठाई के
थरियो पिटला से त तनिक डेराइल ना
कहीं चुनावे में कहिओ उपराइल ना
इस्कूले गइला से कबो डेराते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

विद्यालय पर ताला जबसे लागल बा
लइकन के शैतानी सगरो जागल बा
रहनो कुछ बुढ़वन से लइका सीखे सन
माँग माँग के सुर्ती गुटखा चीखे सन
पढ़ला लिखला के त कवनो बाते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

सगरो दुनिया मोबाइल में घूसल बा
मित्र मण्डली हीत-नात सब छूटल बा
आइल-गइल बंद भइल ससुरारी के
उमर बढ़ल बा मुर्गा अउर बरारी के
चोखा से बेसी अब कुछु भेटाते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

साबुन सेम्पू नइखे ना बा कंघी ले
चालू रही लागत बा ई बंदी ले
पति-पत्नी के झगरा बढ़ल बुलंदी ले
फाटि गइल बा कुर्ता अउरी बंडी ले
झगरा के ई भूत अभीं उधियाते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

येकरा डरे सभे इहाँ डेराइल बा
पूरा दुनिया बंद भइल घबराइल बा
बाकिर दारू से कोरोना भागेला
कोरोना के बैरी साइत लागेला
मयखाना प लाइन कबो ओराते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

परसादी के तरिये रोज बटात हवे
मेहनतकश बा उहे लाठी खात हवे
बिन गलती रोवत आ टोवत जात हवे
लोकतंत्र पर कइसन ई आघात हवे
भीड़ बढ़ावेला ऊ कबो थुराते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

काम कइल जाताटे दुखवे बाटे के
चाहत ना रहनी हँ बात उपाटे के
हालत देखीं जा के रउआ हाटे के
मजदूरा लो घर के बा ना घाटे के
सत्ता के अब मद में पीर सुनाते नइखे-
कइसन रोग कोरोना बा कि जाते नइखे

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 08/04/2021

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