कविता · Reading time: 1 minute

ओल के चोखा

भइया हो हम गइल रहनी, पहिले पहिल ससुरारी में।
दही, पनीर सह मुर्गा, अण्डा, घीउ पड़ल तरकारी में।
नाश्ता आइल नाश्ता ऊपर, चाय क ऊपर चाय चले।
सासु,सार,सरहज,साली सब, हाल पुछें लो पले-पले।
छेंवकि बघारि के भोजन बनुवे, पूआ अउर पकौड़ी।
निहोरा पर भइल निहोरा, बबुआ लीं तनिं अउरी।
पास पड़ोस के लगुआ-भगुआ, हँसी-हंँसी के बतियावें।
कनखी मारी-मारी के साली, हमरो दिल बहलावें।
पाहुन कुछऊ खाते नइखीं, सासु उलहना खूब करें।
खातिरदारी के चर्चा तऽ, भइल रहल तब घरे-घरे।
मनवा पागल भइल खुशी से, गार्डन-गार्डन हृदय भइल।
लागल जइसे सफल भइल हऽ, पछिला जन्म क पुन्य कइल।
भइया हो कुछ समय बितल हऽ, दिन महिना साल गइल।
आदर नाहीं ससुरारी में, सुखवा सब सपना भइल।
ऊ दिनवा ना लौट के आई, समय बड़ी हरजाई।
दुअरे पर अब बीछत रामा, पाहुन के चरपाई।
करिहऽ जनी बिधाता कबहूँ, केहुए साथे धोखा।
लउकी की तरकारी साथे, मिलत ओल के चोखा।

(स्वरचित मौलिक)
#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य
तुर्कपट्टी, देवरिया, (उ.प्र.)
☎️7379598464

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