गीत · Reading time: 1 minute

एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो

एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो।
हो जाता देखा केतना समय के बर्बादी हो।
एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो।
सुनर बा बिजया केतना ,कैसे बखानी हम।
कैसे सुनाई वोकर ,दुख के कहानी हम।
केहू त अगुआ वोकर शादी करादी हो।
एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो।
मेहनत में माहिर बाटे बुद्धि में शातिर हो।
चांद जमीं प लाई मेंहरी के खातिर हो।
बरात में जाये खातिर, पिटाई मुनादी हो।
एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो
भौजी से लड़त बा और माई से लड़त बा।
माई कहेले ओहके ,ई उफ़्फ़र पड़त बा।
शादी न होई जल्दी त ,आग लगादी हो।
एहू साल हो न पवले विजया के शादी हो।
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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अपने वक्त को एक आईना दिखा जाऊँगा। आज लिख रहा हूँ कल मैं लिखा जाऊँगा।। -सिद्धार्थ गोरखपुरी
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